राजस्थान के पवित्र वनों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
18 दिसंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के वन विभाग को निर्देश दिया कि वे सभी सैकरेड ग्रोव्स (Sacred Groves) को ग्राउंड और सैटेलाइट मैपिंग के जरिए चिन्हित करें। इन जंगलों की पहचान केवल उनके सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व के आधार पर की जाएगी, न कि उनके आकार के आधार पर। इसके बाद, इन्हें ‘वन’ की श्रेणी में रखकर ‘समुदाय संरक्षण क्षेत्र’ (Community Reserves) के रूप में घोषित किया जाएगा।
हालांकि, यह फैसला वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act – FRA) 2006 से टकराव में है, जो समुदायों के अधिकारों को मान्यता देकर ग्राम सभाओं को वन प्रबंधन का अधिकार देता है। राजस्थान में करीब 25,000 पवित्र वन क्षेत्र (Sacred Groves) हैं, जो 6 लाख हेक्टेयर भूमि में फैले हुए हैं।
मामला क्या था?
T.N. Godavarman बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘वन भूमि’ (Forest Land) में वे सभी क्षेत्र शामिल होंगे, जो सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज हैं, भले ही उनकी मालिकियत किसी के पास भी हो।
2004 में राजस्थान सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने केवल उन्हीं पवित्र वनों को ‘वन’ माना, जिनका क्षेत्रफल 5 हेक्टेयर या उससे अधिक था और जिनमें कम से कम 200 पेड़ प्रति हेक्टेयर थे। बाकी क्षेत्रों को वन की श्रेणी में नहीं रखा गया।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने इस पर आपत्ति जताई और 2018 में राजस्थान सरकार को सभी पवित्र वनों को ‘वन भूमि’ के रूप में अधिसूचित करने का आदेश दिया। 2024 की शुरुआत में राजस्थान सरकार ने कोर्ट को बताया कि इन वनों को ‘वन भूमि’ के रूप में चिह्नित किया जा रहा है।
समुदायों के लिए पवित्र वन का क्या महत्व है?
Sacred Groves वे जंगल होते हैं, जिन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा पवित्र माना जाता है और उनकी सुरक्षा के लिए सख्त नियम लागू होते हैं। इनमें से कई में संसाधनों का दोहन पूरी तरह प्रतिबंधित होता है, सिर्फ औषधीय पौधों तक पहुंच की अनुमति होती है।
भारत में 1 से 10 लाख पवित्र वन क्षेत्र हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक हैं। इनका नामकरण अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से हुआ है:
- कर्नाटक – देवर काडु
- हिमाचल प्रदेश – देवबन
- केरल – कावु, सर्प कावु
- झारखंड और छत्तीसगढ़ – सरना, देवबनी
- ओडिशा – जाहेरा, ठाकुरम्मा
- महाराष्ट्र – देवगुड़ी
- मेघालय – की लाव लिंगदोह, की लाव निआम
ये क्षेत्र सिर्फ धार्मिक महत्व ही नहीं रखते बल्कि स्थानीय जैव विविधता के केंद्र भी हैं। कई औषधीय पौधों और दुर्लभ जीवों के लिए ये जंगल सुरक्षित ठिकाने होते हैं।
‘Community Reserves’ क्या होते हैं?
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WLPA) 2002 में ‘समुदाय संरक्षण क्षेत्र’ (Community Reserves) की अवधारणा जोड़ी गई। यह ऐसे क्षेत्र होते हैं, जहां स्थानीय समुदायों ने ‘वन और जैव विविधता संरक्षण’ के लिए स्वेच्छा से पहल की होती है।
सामुदायिक संरक्षण क्षेत्रों में स्थानीय लोग इन कार्यों के लिए उत्तरदायी होते हैं:
- वन्यजीव अपराधों को रोकना
- वन भूमि को नुकसान पहुंचाने से बचाना
- अवैध गतिविधियों की सूचना देना
- जंगल में आग लगने या वन्यजीवों की मृत्यु होने पर रिपोर्ट करना
सरकार को ‘समुदाय संरक्षण प्रबंधन समिति’ (Community Reserve Management Committee) गठित करने का आदेश दिया गया है, जिसमें ग्राम पंचायत, वन विभाग और स्थानीय समुदाय के सदस्य शामिल होंगे।
क्या वन विभाग का अधिग्रहण समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन करेगा?
अगर पवित्र वनों को FRA के तहत लाया जाता, तो ये ‘सामुदायिक वन संसाधन’ (Community Forest Resources) के रूप में मान्यता प्राप्त होते।
FRA के अनुसार:
- समुदायों को अपने पारंपरिक वन क्षेत्रों पर स्वामित्व प्राप्त होता।
- ग्राम सभाएं वनों का संरक्षण और प्रबंधन कर सकती थीं।
- राज्य सरकारों का कर्तव्य होता कि वे ग्राम सभाओं को संरक्षण योजनाओं में सहायता करें।
लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, इन क्षेत्रों का नियंत्रण वन विभाग को सौंप दिया जाएगा, जिससे स्थानीय समुदायों का अधिकार सीमित हो जाएगा।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से परंपरागत रूप से समुदायों द्वारा संरक्षित जंगलों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ेगा। हालांकि, यह जैव विविधता संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन स्थानीय समुदायों के अधिकारों और परंपराओं को अनदेखा किया जा सकता है।
सरकार को FRA और WLPA के बीच संतुलन बनाकर ऐसा समाधान निकालना चाहिए, जिससे पर्यावरण संरक्षण और समुदायों के अधिकारों की रक्षा दोनों हो सके।