नई दिल्ली: भारत की ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा का आधार मानी जाने वाली आशा (ASHA) कार्यकर्ता न केवल मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, बल्कि टीकाकरण और स्वच्छता जागरूकता बढ़ाने का भी काम करती हैं। 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के तहत नियुक्त की गईं आशा कार्यकर्ताओं ने कोविड-19 महामारी के दौरान भी अभूतपूर्व योगदान दिया। लेकिन इनके संघर्ष और मेहनत के बावजूद उचित वेतन का सवाल अब भी बना हुआ है।
समुदाय से चयन, लेकिन मेहनताना सवालों के घेरे में
आशा कार्यकर्ताओं का चयन गांवों में ही स्वयं सहायता समूहों, आंगनवाड़ी केंद्रों और स्वास्थ्य समितियों की मदद से किया जाता है। 25-45 वर्ष की महिलाएं इस भूमिका के लिए चुनी जाती हैं और प्रशिक्षण के बाद काम शुरू करती हैं। ‘आशा’ शब्द का अर्थ ‘उम्मीद’ होता है, और ये महिलाएं निस्संदेह ग्रामीण भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद बनी हुई हैं।
हालांकि, जब आशा कार्यकर्ताओं से उनकी स्थिति पर बात की जाती है, तो यह एक दुखद कहानी उभर कर आती है। वे अत्यधिक कार्यभार, कम वेतन और अनिश्चित भविष्य की स्थिति से जूझ रही हैं। विडंबना यह है कि 2022 में इन्हें WHO द्वारा ग्लोबल लीडर्स अवार्ड से सम्मानित किया गया, लेकिन अभी भी इन्हें सरकार से उचित वेतन और सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
हड़तालों और वेतन वृद्धि का इतिहास
आशा कार्यकर्ताओं की सैलरी पूरी तरह से प्रदर्शन और उम्र पर निर्भर करती है। इसके अलावा, इन्हें अलग-अलग प्रोत्साहन राशियां दी जाती हैं।
- 2015: वेतन ₹2000 किया गया।
- 2016: वेतन में ₹1500 की वृद्धि।
- 2021 (कोविड काल): ₹1250 की बढ़ोतरी।
- 2024: एक महीने की हड़ताल के बाद ₹5000 की वृद्धि हुई और कुछ अतिरिक्त प्रोत्साहन दिए गए।
इसके बावजूद, अधिकांश आशा कार्यकर्ता मानती हैं कि उनका वेतन उनके योगदान के अनुरूप नहीं है। एक आशा कार्यकर्ता औसतन ₹16,000 प्रति माह कमाती है, लेकिन इनमें से केवल ₹3000 ही निश्चित वेतन है, बाकी प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन पर निर्भर करता है।
‘स्वयंसेवक’ कहलाकर शोषण का शिकार
आशा कार्यकर्ताओं को आधिकारिक तौर पर स्वयंसेवक (Volunteer) माना जाता है, जिससे उन्हें सरकारी कर्मचारियों की तरह सुविधाएं नहीं मिलतीं। महामारी के दौरान जब उन्होंने कोविड-19 जांच, होम आइसोलेशन निगरानी और जागरूकता अभियानों में दिन-रात काम किया, तब भी उन्हें उतनी राहत नहीं मिली।
देशभर में कई जगहों पर संघों द्वारा प्रदर्शन किए गए, जहां उन्होंने पुरानी बकाया राशि, मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा की मांग उठाई।
महिलाओं के लिए नया आत्मनिर्भरता का जरिया
हालांकि, कठिनाइयों के बावजूद, कई आशा कार्यकर्ताओं के लिए यह नौकरी आत्मनिर्भरता की नई राह बन गई है।
नीरज देवी, जिनके पति का 2023 में निधन हो गया, कहती हैं,
“मेरी सहेली मधु ने मुझे संभाला और आत्मनिर्भर बनने का हौसला दिया। यह नौकरी मेरे लिए उम्मीद की किरण थी।”
मधु, जो घरेलू हिंसा की शिकार रह चुकी हैं, कहती हैं,
“आशा कार्यकर्ता बनने के बाद मुझे आत्मसम्मान का एहसास हुआ। मैं अपने बच्चों के लिए कपड़े और स्कूल की चीजें खरीदने में सक्षम हुई हूं। अब मुझे अपने पति पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं।”
पिंकी देवी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है,
“मुझे शादी के बाद काफी घरेलू हिंसा झेलनी पड़ी। लेकिन जबसे मैंने यह नौकरी शुरू की, मैं अपने पैरों पर खड़ी हो पाई हूँ।”
सुरक्षा और सम्मान का मुद्दा
आशा कार्यकर्ताओं को कई बार रात में डिलीवरी कराने अस्पताल जाना पड़ता है, जिससे परिवार वालों की नाराजगी झेलनी पड़ती है।
साथ ही, जब वे यौन स्वास्थ्य और गर्भनिरोधक जागरूकता फैलाने जाती हैं, तो अक्सर पुरुषों की अभद्र टिप्पणियों और अश्लील इशारों का सामना करना पड़ता है।
क्या होगा समाधान?
- निश्चित वेतन बढ़ाया जाए, ताकि उन्हें पूरी तरह प्रोत्साहन राशि पर निर्भर न रहना पड़े।
- सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए, जिससे वे सभी सरकारी लाभों और सुरक्षा योजनाओं का लाभ उठा सकें।
- रात में सुरक्षा और परिवहन सुविधाओं की व्यवस्था की जाए।
- मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के लिए योजनाएं बनाई जाएं।
आशा कार्यकर्ता भारत की स्वास्थ्य सेवा का मजबूत आधार हैं। इनके योगदान को पहचानते हुए, सरकार को इन्हें बेहतर वेतन और सुविधाएं देने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। तभी वे ‘आशा’ बनकर हर जरूरतमंद को स्वास्थ्य सेवाएं दे पाएंगी।