खास बातें
मंगलवार की शाम को अयोध्या के करसेवकपुरम से यात्रा की रवानगी
यात्रा में उपयोग किए जा रहे टाटा मिनी ट्रक को रथ का स्वरूप दिया गया
केरल के सीपीएम नेताओं ने कहा चुनावों के मद्देनजर मुद्दा उठा रही भाजपा
अयोध्या:
जब राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में के बाद फैसला आने की संभावना है, तब दक्षिण पंथी समूह विश्व हिंदू परिषद के समर्थन से मंदिरों के नगर अयोध्या से मंगलवार को "राम राज्य रथयात्रा" का शुभारंभ किया जाएगा. यह यात्रा तमिलनाडु के रामेश्वरम में समाप्त होगी और इससे पहले अगले दो महीनों में छह राज्यों से गुजरेगी. अयोध्या में राम मंदिर के लिए अभियान सन 1990 में लालकृष्ण आडवाणी ने शुरू किया था, जिससे भाजपा देश में एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बन गई. पिछले कुछ वर्षों में इस मसले को भाजपा ने अपने घोषणा-पत्रों में प्राथमिकता से हटाकर पीछे के पन्नों में धकेल दिया था. यहां तक कि उत्तर प्रदेश में पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में भी यह मुद्दा नहीं उठाया गया. लेकिन यूपी में सत्ता संभालने के बाद, गोरखपुर के पुजारी-राजनेता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आश्वासन दिया है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण एक महत्वपूर्ण एजेंडा है. दीपावली की पूर्व संध्या पर मंदिर के भव्य प्रदर्शन और धार्मिक पर्यटन के लिए कई योजनाओं के साथ, भगवाधारी मुख्यमंत्री ने संकेत दिया था कि यह मामला उनकी सरकार के लिए प्राथमिकता में है.
यह भी पढ़ें : राम राज्य रथयात्रा को मंगलवार की शाम को अयोध्या के करसेवकपुरम से विदा किया जाएगा. यह वह जगह है जहां  1990 के दशक में व्हीएचपी ने एक वर्कशॉप की स्थापना की. यहां मजदूर इस आशा के साथ खंभे तैयार कर रहे हैं कि उन्हें एक दिन राम मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल किया जाएगा. राम राज्य रथयात्रा में एक रथ होगा. एक टाटा मिनी ट्रक को रथ का स्वरूप दिया गया है. यह यात्रा भाजपा शासित उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के अलावा कांग्रेस शासित कर्नाटक से गुजरेगी. कर्नाटक में पार्टी इस साल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से सत्ता हथियाने की उम्मीद कर रही है. यात्रा अंतिम चरण में केरल से गुजरेगी, जहां भाजपा अपने पैर फैलाने की कोशिश में जुटी है. यह भी पढ़ें : आधिकारिक तौर पर यह रथयात्रा महाराष्ट्र के एक सामाजिक संगठन द्वारा आयोजित की जा रही है और इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-बीजेपी से वैचारिक साम्य रखने वाले व्हीएचपी और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जैसे संगठन भाग लेंगे. केरल जैसे गैर भाजपा शासित राज्यों के नेताओं का मानना है कि वे इस विचार के साथ सहज नहीं हैं.  खास तौर पर 1990 में लालकृष्ण आडवाणी द्वारा आयोजित रथ यात्रा के मद्देनजर, जिससे देश के कुछ हिस्सों में हिंसा हुई थी. केरल के वरिष्ठ सीपीएम नेता एमए बेबी ने स्वीकार किया कि वे "बहुत आशंकित" थे और उम्मीद थी कि यात्रा नहीं होगी. यात्रा के विचार को "विभाजनकारी" मानते हुए सीपीएम के नेताओं ने कहा कि हाल ही हुए उपचुनावों में, खास तौर पर राजस्थान में भाजपा को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा. अब विशेष रूप से 2019 के आम चुनावों के मद्देनजर भाजपा इस मुद्दे पर राजनीति करना चाहती है. उन्होंने कहा, "सांप्रदायिक ध्रुवीकरण राजनीतिक मुद्दा है, जिस पर भाजपा और मोदी, खासकर आरएसएस, पर निर्भर हैं." रथयात्रा के आयोजक इसके पीछे किसी भी राजनीतिक उद्देश्यों की बात को खारिज कर रहे हैं. यात्रा की मुख्य आयोजक 'श्री रामदास मिशन यूनिवर्सल सोसाइटी' के महर्षि शांता बंधी ने कहा, "चुनाव करीब आ रहे हैं तो इसमें हमारी क्या गलती? हम भाजपा के लिए अभियान चलाने के लिए इस यात्रा का आयोजन नहीं कर रहे हैं." विश्व हिन्दू परिषद के लंबे समय के प्रवक्ता शरद शर्मा ने सहमति व्यक्त की. उन्होंने कहा कि "इरादा यह है कि अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर का निर्माण किया जाना चाहिए."   यात्रा की योजना को लेकर मुस्लिम याचिकाकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद की मांग पर ध्यान आकर्षित किया है. अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ज़फरयाब गिलानी ने हाल ही में यह स्पष्ट कर दिया कि वे अपनी मस्जिद की मांग नहीं छोड़ेंगे. वे अपने वकीलों से परामर्श लेंगे. उन्होंने कहा कि वे अदालत के मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करते हैं. उन्होंने यह भी मांग की कि सरकार इस मुद्दे पर गौर करे, क्योंकि "रथ यात्रा कानून और व्यवस्था का मामला है."
VIDEO : राम मंदिर की मांग के लिए रथयात्रा
दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद करीब 2,000 लोग मारे गए थे. हजारों दक्षिण पंथी कार्यकर्ताओं ने मस्जिद को ढहा दिया था. यह भगवान राम के जन्मस्थान पर मंदिर बनाने के लिए किया गया था.